Sunday, September 4, 2011

हंसी ठिठोली हर किसी के बस की नहीं होती

मैंने सोचा 
होली पर कुछ
नया किया जाए
भेष बदल कर तमाशा
देखा जाए
नकली मूंछ ,ढाडी लगाईं
ग्रामीण परिवेश के कपडे पहने
जूतियाँ पहनी ,
पगड़ी बाँध,तमाशा देखने
घर से बाहर निकला
गेट पर पाला बाज़ार से
लौट रही पत्नी से पडा
आग उगलते हुए बोली,
किस से पूंछ घर में घुस रहे हो
खबरदार फिर नज़र आए तो
मन में मुस्कराया,
कितना बढ़िया भेष बनाया
पत्नी को भी मूर्ख बनाया
अपनी पीठ को खुद ने 
थपथपाया
कदम आगे बढाया
नज़र पड़ोसी थानेदार की पडी
छूटते ही भद्दी सी गाली
सुननी  पडी
टांगें तोड़ दूंगा,फिर अगर नज़र
तुझ पर पडी
पिटूं उस से पहले ही सर झुकाए
आगे बढ़ गया
बच्चे रंगों से खेल रहे थे
देखते ही जोर से चिल्लाये
होली का भाडू आया ,
रंगों की बौछार से मुझे नहलाया
किसी तरह पीछा छुडाया
तो गली का कुत्ता गुर्राया ,
मुझे अगले मोहल्ले तक दौडाया
रुक कर सांस लेने लगा ,
पता भी ना पडा कब
मोहल्ले के निठल्ले ने,
पीछे से पगड़ी को खींचा ,
मुश्किल से पगड़ी बचाई
थोड़ा और चला तो
हैण्ड पम्प पर पानी भर रही
महिलाओं से पाला पडा,
निठल्ला घूम रहा है,
काम भी किया कर
मुफ्त की रोटी मत तोड़ा कर
पांच रूपये देंगे,
बीस घड़े पानी से भर दे ,
निरंतर हो रहे हमलों से
घबरा गया
फौरन पगड़ी उतारी,
ढाडी मूंछ निकाली
घर की ओर दौड़ लगायी
आज पता चला ,
हर चमकने वाली चीज़
हीरा नहीं होती
हंसी ठिठोली हर किसी के
बस की नहीं होती
अब कभी तमाशा देखने की
इच्छा नहीं होती
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
452—122-03-11

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